Supreme Court Hearing on CEC Gyanesh Kumar: सुप्रीम कोर्ट सोमवार को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कामकाज और चुनाव आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। मामला इस महत्वपूर्ण सवाल से जुड़ा है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले उन शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो संविधान और कानून के तहत बहुसदस्यीय चुनाव आयोग को दी गई हैं।
इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ करेगी। याचिका में चुनाव आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था का पालन सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
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क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता का आरोप है कि चुनाव आयोग के नाम पर कुछ ऐसे फैसले और कदम उठाए गए, जिनमें अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या जानकारी नहीं थी। याचिका में इसी आधार पर सवाल उठाया गया है कि क्या CEC व्यक्तिगत रूप से उस सामूहिक अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को दिया गया है।
वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने 29 सितंबर को CJI के सामने मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अगले सप्ताह सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई थी।
Article 324 और Section 18 पर टिका है मामला
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला दिया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनावों की निगरानी, दिशा और नियंत्रण की संवैधानिक शक्ति Election Commission of India को दी गई है, न कि केवल मुख्य चुनाव आयुक्त को।
याचिका में Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 की धारा 18 का भी उल्लेख है। इस प्रावधान के अनुसार आयोग के कामकाज में जहां संभव हो, सर्वसम्मति से निर्णय लेने की व्यवस्था है और यदि सदस्यों के बीच मतभेद हो तो मामला बहुमत के आधार पर तय किया जाता है।
दो चुनाव आयुक्तों की 14 आपत्तियों का जिक्र
याचिका में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की कथित आपत्तियों का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताई थी।
इन कथित आपत्तियों में चुनाव आयोग की अनुमति के बिना जारी किए गए संचार और आदेश, बैठकों से पहले या बाद में एजेंडा से जुड़े सवाल, विदेश यात्राओं की मंजूरी, Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुंच और पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दाखिल करने जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
हालांकि, याचिका में भी यह स्पष्ट किया गया है कि केवल आपत्तियों के आधार पर यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि प्रत्येक कार्रवाई कानून के विरुद्ध थी। इसके लिए मूल रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग, अप्रूवल शीट और बैठक के दस्तावेजों की जांच जरूरी होगी।
वोटर डेटा और चुनाव आयोग के IT सिस्टम पर भी सवाल
याचिका में मतदाता सूची के डेटाबेस के कथित केंद्रीकरण और चुनाव आयोग के IT सिस्टम में काम के बंटवारे में बदलाव को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ता ने मांग की है कि विवादित फैसलों से जुड़े जरूरी रिकॉर्ड, फाइल नोटिंग, बैठक के मिनट्स और अन्य दस्तावेजों को सुरक्षित रखा जाए, ताकि यह पता लगाया जा सके कि संबंधित फैसले चुनाव आयोग की वैधानिक प्रक्रिया के तहत लिए गए थे या नहीं।
याचिका में क्या मांग की गई है?
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से कई महत्वपूर्ण राहतों की मांग की गई है। इनमें प्रमुख रूप से:
- अनुच्छेद 324 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल चुनाव आयोग द्वारा बहुसदस्यीय निकाय के रूप में किए जाने की घोषणा।
- चुनाव आयोग के नाम से जारी किसी आदेश, निर्देश या संचार के लिए निर्धारित सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का पालन।
- जरूरत पड़ने पर सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर निर्णय लेने की व्यवस्था लागू करने का निर्देश।
- विवादित फैसलों से जुड़े मूल रिकॉर्ड को पेश करने और सुरक्षित रखने का निर्देश।
- कथित तौर पर CEC द्वारा आयोग की सामूहिक शक्तियों के इस्तेमाल के संबंध में क्वो वारंटो जैसी राहत पर विचार।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी नजर
यह मामला चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका से जुड़े संवैधानिक सवालों को सामने लाता है। सुप्रीम कोर्ट अब यह देखेगा कि याचिका में उठाए गए सवालों पर कानून और संविधान के तहत किस तरह विचार किया जाए।
नोट: याचिका में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। चुनाव आयोग ने पहले इन आरोपों के जवाब में कहा है कि आयोग के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।

