मुंबई (गिरजा शंकर अग्रवाल)/एंटरटेनमेंट डेस्क: सच्ची लगन और कला की साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती, और इस बात को सच साबित कर दिखाया है मशहूर ग़ज़ल शायर मिर्ज़ा अब्बास अली ने। साहित्य और संगीत की दुनिया में “नवाज़” (Nawaz) के उपनाम (तखल्लुस) से मशहूर मिर्ज़ा अब्बास अली की लिखी ग़ज़ल अब देश की प्रतिष्ठित म्यूजिक कंपनी टी-सीरीज़ (T-Series) पर रिलीज हो गई है। उनके 33 वर्षों के लंबे साहित्यिक सफर को अब एक नया और बड़ा मुकाम हासिल हुआ है।
मैसूर से हुई शुरुआत, उस्तादों की आवाज़ बनी प्रेरणा
मिर्ज़ा अब्बास अली ‘नवाज़’ का जन्म 24 फरवरी 1972 को कर्नाटक के मैसूर में हुआ था। मैसूर विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी करने वाले नवाज़ को बचपन से ही ग़ज़लों का गहरा शौक था।
उन्होंने जगजीत सिंह, गुलाम अली, मेहदी हसन, चंदन दास और आबिदा परवीन जैसे महान ग़ज़ल गायकों को सुनना शुरू किया।
इन महान गायकों की आवाज़ ने उनके भीतर के सोए हुए कवि को जगा दिया। इसके बाद उन्होंने उस्ताद फ़ैज़ुल्ला खान ‘फ़ैज़’ साहब के कुशल मार्गदर्शन में ग़ज़लें लिखना शुरू किया।
15 मार्च 1993 को पहली बार उन्हें एक कवि के रूप में उर्दू मुशायरे में आमंत्रित किया गया था। वह जौन एलिया, अहमद फ़राज़ और मोहसिन नकवी जैसे दिग्गज शायरों से बेहद प्रेरित हैं।
दुबई का सफर और गुलाम अली का ‘पिता’ जैसा प्यार
नवाज़ के जीवन में एक दौर ऐसा भी आया जब वे 10 वर्षों तक दुबई में रहे। यह समय उनके लिए बेहद खास साबित हुआ।
दुबई में प्रवास के दौरान उन्हें जगजीत सिंह, गुलाम अली, मेहदी हसन, उस्ताद राशिद खान और हरिहरन जैसी महान संगीत हस्तियों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
नवाज़ बताते हैं कि महान ग़ज़ल गायक गुलाम अली साहब उन्हें एक बेटे की तरह बहुत प्यार करते हैं और वे आज भी उनके लगातार संपर्क में हैं।
पिछले 33 वर्षों की अपनी साधना में नवाज़ अब तक एक हजार से अधिक ग़ज़लें, गीत और भजन लिख चुके हैं।
डी.एन. शास्त्री की पारखी नज़र और टी-सीरीज़ का मुकाम
नवाज़ के जीवन में बड़ा बदलाव तब आया जब कुछ साल पहले बेंगलुरु के एक म्यूजिकल शो में उनकी मुलाकात डी.एन. शास्त्री साहब से हुई।
जब शास्त्री जी को पता चला कि मिर्ज़ा अली नवाज़ एक बेहतरीन ग़ज़ल शायर हैं, तो उन्होंने नवाज़ की ग़ज़ल सुनी।
शास्त्री साहब को यह ग़ज़ल इतनी पसंद आई कि उन्होंने इसे संगीतबद्ध करने का फैसला कर लिया।
इसके बाद, बॉलीवुड और सैंडलवुड के मशहूर अभिनेता कमल घिमिरे के सहयोग से इस ग़ज़ल को ‘टी-सीरीज़’ के बैनर तले रिलीज़ करने की पूरी व्यवस्था की गई।
मिर्ज़ा अली नवाज़ अपनी इस बड़ी कामयाबी का श्रेय डी.एन. शास्त्री साहब और कमल घिमिरे को देते हैं और उन्हें तहे दिल से धन्यवाद करते हैं। उनका यह सफर उन सभी नए कलाकारों के लिए एक मिसाल है, जो अपनी कला के प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं।

