फर्जी हस्ताक्षर से टेंडर की तिथि बढ़ाने का आरोप, ईओ और कंप्यूटर ऑपरेटर पर केस
बदायूं।अलापुर नगर पंचायत में विकास कार्यों के लिए जारी ई-निविदा प्रक्रिया में कथित फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है।नगर पंचायत अध्यक्ष हुमा बी के फर्जी हस्ताक्षर बनाकर टेंडर की अंतिम तिथि बढ़ाए जाने का आरोप लगाया गया है।मामले में न्यायालय सीजेएम के आदेश पर थाना वजीरगंज में अलापुर के अधिशासी अधिकारी (ईओ) त्रिवेंद्र कुमार और सैदपुर नगर पंचायत के कंप्यूटर ऑपरेटर आलम रहमान के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की गई है।पुलिस ने धोखाधड़ी, जालसाजी, कूटरचना और आपराधिक षड्यंत्र समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
नगर पंचायत अध्यक्ष की ओर से न्यायालय में दिए गए प्रार्थना पत्र में पूरे मामले का विवरण देते हुए गंभीर आरोप लगाए गए हैं।उनके अनुसार नगर पंचायत के विकास कार्यों के लिए ई-निविदाएं आमंत्रित की गई थीं।निविदा प्रक्रिया में शामिल होने की अंतिम तिथि 20 दिसंबर 2025 निर्धारित की गई थी।अध्यक्ष का आरोप है कि इसके बाद उनकी जानकारी और सहमति के बिना निविदा की अवधि बढ़ाने के लिए दूसरा पत्र तैयार किया गया।
अध्यक्ष हुमा बी के अनुसार वह 12 से 23 दिसंबर 2025 तक चिकित्सकीय कारणों से दिल्ली में उपचार कर रही थीं। इसी अवधि के दौरान उनकी अनुपस्थिति का फायदा उठाया गया।आरोप के मुताबिक ईओ त्रिवेंद्र कुमार ने सैदपुर नगर पंचायत के कंप्यूटर ऑपरेटर आलम रहमान के साथ मिलकर उनके फर्जी हस्ताक्षर किए और नए पत्रांक संख्या तैयार कराया।इसी पत्र के जरिये ई-निविदा की अंतिम तिथि को आगे बढ़ा दिया गया।अध्यक्ष का आरोप है कि जिस समय निविदा की मूल अंतिम तिथि निकल चुकी थी, उस समय उनकी अनुपस्थिति में तैयार किए गए पत्र का इस्तेमाल टेंडर प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए किया गया।इससे पूरी निविदा प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए।
न्यायालय में दिए गए प्रार्थना पत्र में अध्यक्ष ने आरोप लगाया है कि टेंडर की अवधि बढ़ाने का उद्देश्य किसी सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत नहीं था, बल्कि चहेते ठेकेदारों को निविदा अपलोड करने का अतिरिक्त मौका देकर उन्हें लाभ पहुंचाना था। अध्यक्ष के मुताबिक उन्हें इस मामले की जानकारी बाद में नगर पंचायत कार्यालय के कर्मचारियों और कॉल-लॉग के माध्यम से हुई। जानकारी मिलने के बाद उन्होंने मामले की शिकायत पुलिस प्रशासन और संबंधित उच्चाधिकारियों से की। उनका कहना है कि शिकायत के बावजूद जब प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।रिपोर्ट-जयकिशन सैनी

