दो नामों की एक कहानी : गारबपुर उर्फ रुस्तमपुर, जहाँ बहादुरी से पड़ा रुस्तमपुर*
संवाददाता आदमपुर समर इंडिया
मौ0 शकील
Amroha village history
अमरोहा जिले की हसनपुर तहसील से 20 किलोमीटर दूर बसा है एक अनोखा गांव – गारबपुर उर्फ रुस्तमपुर। नाम में उर्फ शब्द सुनकर हर नया आदमी सोचता है कि आखिर एक गांव के दो नाम क्यों? इसी सवाल का जवाब गांव के इतिहास में छिपा है।
राजस्व रिकॉर्ड में गांव का मूल नाम गारबपुर दर्ज है। बुजुर्ग बताते हैं कि यह नाम कई सौ साल पुराना है। वहीं रुस्तमपुर नाम लोगों की जुबान से जुड़ा है। स्थानीय मान्यता है कि गांव के लोग शुरू से ही बेहद मेहनती, ताकतवर और बहादुर रहे हैं। कुश्ती और पहलवानी में इस गांव के युवकों का डंका बजता था। फारसी किस्सों के सबसे शक्तिशाली योद्धा रुस्तम के नाम पर लोगों ने इसे रुस्तमपुर कहना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे कागज में गारबपुर और जुबान पर रुस्तमपुर दोनों चलने लगे, तो प्रशासन ने इसे जोड़कर गारबपुर उर्फ रुस्तमपुर कर दिया।
गांव के 95 वर्षीय बुजुर्ग भोलू खा ठेकेदार पुत्र चांद खां बताते हैं कि पहले यहां बड़े-बड़े जमींदार और हल-बैल वाले किसान होते थे। खेती ही सबका मुख्य सहारा थी। गांव के लोग सीधे, अतिथि-सत्कार वाले और अपनी आन पर टिकने वाले माने जाते हैं। बताया जाता है कि आजादी से पहले भी यहां के लोगों ने नील की खेती का विरोध किया था। गांव में आज भी पुराने कुएं, पेड़ और मिट्टी के चूल्हों की सौंधी यादें बची हैं। नई पीढ़ी अब दिल्ली हरियाणा राजस्थान बाहर देशों तक नौकरी करने लगे है, लेकिन खेती से लगाव नहीं छूटा इस गांव के युवा आज भी बहुत सरकारी नौकरी पर निर्भर है
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सरकारी आंकड़ों के अनुसार गांव का कुल क्षेत्रफल 353.64 हेक्टेयर है। इसमें से 21.18 हेक्टेयर गैर कृषि भूमि है, बाकी सारी जमीन सिंचित है। जनगणना 2011 के अनुसार गांव की कुल आबादी 1775 है, जिसमें 313 घर हैं। महिला आबादी 47.2 प्रतिशत यानी 838 है। साक्षरता दर 50.4 प्रतिशत है, जिसमें पुरुषों की साक्षरता अधिक है। गांव में अनुसूचित जाति की आबादी 39 प्रतिशत यानी 693 के करीब है इस गांव के मुस्लिम युवाओं की बात करें तो सरकारी नौकरी में सबसे ज्यादा प्रतिशत हैं गांव में सरकारी प्राइमरी स्कूल है, जबकि इलाज के लिए सैदनगली कस्बा जो 9 किमी दूर जाना पड़ता है।
गांव के लोग आज भी चाहते हैं कि उनके गांव का इतिहास किताबों में दर्ज हो और रुस्तमपुर नाम की बहादुरी की पहचान आगे भी बनी रहे।

