उत्तरकाशी। देवभूमि उत्तराखंड के सीमांत जिले उत्तरकाशी के रक्षक और ‘नगर कोतवाल’ के रूप में पूजे जाने वाले ईष्ट देव कंडार देवता का प्रकटोत्सव आज पूरी श्रद्धा, आस्था और पारंपरिक धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है। इस पावन अवसर पर संकट हरने वाले देवता के दर्शनों और उनका आशीर्वाद लेने के लिए सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का भारी हुजूम उमड़ पड़ा है।
नगर के रक्षक हैं कंडार देवता पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कंडार देवता को उत्तरकाशी शहर का क्षेत्रपाल यानी ‘कोतवाल’ माना जाता है। स्थानीय लोगों का यह अटूट विश्वास है कि कंडार देवता पूरे नगर की रक्षा करते हैं और क्षेत्र में आने वाली हर प्राकृतिक आपदा या संकट को हर लेते हैं। यही कारण है कि शहर में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत या विपत्ति के समय सबसे पहले कंडार देवता का ही स्मरण और आह्वान किया जाता है।
गूंजे जयकारे, दिखी अटूट आस्था प्रकटोत्सव के विशेष अवसर पर देवता के मंदिर को फूलों से भव्य रूप से सजाया गया है। पारंपरिक वाद्य यंत्रों— ढोल, दमाऊं और रणसिंगे की गूंज के बीच देवता की विशेष पूजा-अर्चना और आरती की गई। देवता की एक झलक पाने के लिए केवल उत्तरकाशी शहर ही नहीं, बल्कि दूर-दराज के गांवों से भी ग्रामीण बड़ी संख्या में यहां पहुंचे हैं। हर तरफ “कंडार देवता की जय” के जयकारे गूंज रहे हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया है।
मेले जैसा उल्लास और पारंपरिक उल्लास प्रकटोत्सव के चलते पूरे मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में एक भव्य मेले जैसा माहौल है। पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालु भजन-कीर्तन कर रहे हैं। श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर समिति और स्थानीय प्रशासन ने दर्शन के लिए विशेष इंतजाम किए हैं, ताकि सभी भक्त सुचारू रूप से अपने ईष्ट देव के दर्शन कर सकें।
इस दौरान क्षेत्र के बुजुर्गों से लेकर युवाओं और बच्चों तक में अपने देवता के प्रति गहरी आस्था और उल्लास देखने को मिल रहा है।

