सरकारी नौकरियों के लिए चरित्र सत्यापन के नए नियमों पर सियासत गरमा गई है। समाजवादी पार्टी ने योगी सरकार के इस फैसले को ‘अंग्रेजी हुकूमत’ की याद दिलाने वाला बताते हुए तीखा हमला बोला है। सपा प्रवक्ता उदयवीर सिंह ने कहा कि स्वतंत्र भारत में विरोध का अधिकार संवैधानिक गारंटी है, जहां सत्ता लोकतांत्रिक चुनावों से बदलती है।
क्या हैं नए नियम
28 अक्टूबर को नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज के हस्ताक्षर से जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, हिंसा के जरिए मौजूदा व्यवस्था बदलने की वकालत करने वाले संगठनों से जुड़े अभ्यर्थी सरकारी नौकरी के अयोग्य माने जाएंगे। यह नियम सभी सरकारी विभागों, निगमों, परिषदों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती पर लागू होगा। 21 वर्ष की आयु के बाद के तीन वर्षों की गतिविधियों को सक्रिय संलिप्तता का प्रमाण माना जाएगा।
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विपक्ष की आपत्ति
सपा के साथ-साथ CPI-M ने भी इन नियमों की निंदा की है। विपक्ष का कहना है कि यह प्रावधान युवाओं और आंदोलनकारी छात्र-युवा शक्ति को निशाना बना सकता है। उदयवीर सिंह ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की आत्मा है और इसे अपराध की श्रेणी में रखना खतरनाक है।
रिपोर्टों के अनुसार ये संशोधित नियम इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के परिप्रेक्ष्य में जारी किए गए हैं। विपक्ष का तर्क है कि अदालत के निर्देशों की आड़ में सरकार ने दायरा इतना बढ़ा दिया है कि उसका दुरुपयोग हो सकता है — खासकर तब, जब ‘हिंसक व्यवस्था परिवर्तन’ जैसे शब्दों की व्याख्या प्रशासन के हाथ में हो।
सरकार की सफाई
विवाद बढ़ने पर सरकार ने सफाई दी है कि सिर्फ राजनीतिक विचारधारा, शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक गतिविधि, FIR दर्ज होना या जांच लंबित होना अपने आप किसी अभ्यर्थी को अयोग्य नहीं ठहराएगा। सरकार का कहना है कि प्रावधानों को संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए, न कि प्रदर्शनकारियों पर कंबल प्रतिबंध के रूप में। हालांकि, विपक्ष इस सफाई से संतुष्ट नहीं है और मुद्दे को 2027 के चुनावी नैरेटिव से जोड़ रहा है।
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