CAFE 3 Rules नई दिल्ली: भारत के तेजी से बढ़ते ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए Corporate Average Fuel Efficiency (CAFE) Rules 3 एक बड़ा नीतिगत बदलाव लेकर आया है। 29 सितंबर 2026 को नोटिफाई किए गए CAFE-III नियमों में कार कंपनियों को सिर्फ किसी खास मॉडल या इंजन तकनीक पर फोकस करने के बजाय अपनी पूरी गाड़ियों की रेंज की औसत फ्यूल एफिशिएंसी और CO2 उत्सर्जन को बेहतर बनाने का लक्ष्य दिया गया है।
नए नियम 1 अप्रैल 2027 से 31 मार्च 2032 तक लागू रहेंगे। इस दौरान वाहन निर्माता कंपनियों को हर साल पहले से ज्यादा सख्त फ्यूल एफिशिएंसी और उत्सर्जन मानकों को पूरा करना होगा। खास बात यह है कि सरकार ने किसी एक फ्यूल या टेक्नोलॉजी को अनिवार्य करने के बजाय कंपनियों को अपने हिसाब से रणनीति तय करने की गुंजाइश दी है।
CAFE 3 Rules में क्या बदला?
CAFE-III नियमों का मुख्य उद्देश्य भारत में वाहनों की औसत फ्यूल एफिशिएंसी बढ़ाना और कारों से होने वाले CO2 उत्सर्जन को कम करना है। नए नियम किसी एक कार मॉडल पर लागू होने के बजाय ऑटोमेकर की पूरी फ्लीट के औसत प्रदर्शन को ध्यान में रखेंगे।
उदाहरण के तौर पर, Maruti Suzuki जैसी कंपनी के पास छोटी पेट्रोल कारों के साथ SUV, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहन भी हैं। ऐसे में CAFE नियमों के तहत कंपनी की पूरी गाड़ियों की रेंज की औसत फ्यूल एफिशिएंसी और CO2 उत्सर्जन को देखा जाएगा।
2027 से 2032 तक सख्त होंगे फ्यूल एफिशिएंसी लक्ष्य
CAFE-III के तहत 2027-28 में बेसलाइन फ्यूल खपत का लक्ष्य 3.996 लीटर प्रति 100 किलोमीटर रखा गया है। इसे धीरे-धीरे घटाकर 2031-32 तक 3.3273 लीटर प्रति 100 किलोमीटर तक लाने का लक्ष्य है।
यानी आने वाले वर्षों में कार कंपनियों को अपनी गाड़ियों की औसत फ्यूल एफिशिएंसी लगातार बेहतर करनी होगी।
CO2 उत्सर्जन में भी होगी कमी
नए CAFE नियमों में फ्यूल एफिशिएंसी के साथ-साथ फ्लीट एवरेज CO2 उत्सर्जन को कम करने पर भी जोर दिया गया है।
FY2027-28 में CO2 उत्सर्जन का लक्ष्य 94.76 ग्राम प्रति किलोमीटर से घटाकर FY2031-32 तक करीब 76.77-78.90 ग्राम प्रति किलोमीटर तक लाने की योजना है।
इसका सीधा मतलब है कि वाहन कंपनियों को आने वाले वर्षों में ज्यादा फ्यूल एफिशिएंट और कम उत्सर्जन वाले वाहन तैयार करने होंगे।
EV और हाइब्रिड कारों को मिलेगा फायदा
CAFE-III नियमों में इलेक्ट्रिक और कम उत्सर्जन वाली तकनीकों को प्रोत्साहन देने के लिए अलग-अलग वॉल्यूम फैक्टर भी शामिल किए गए हैं।
बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल (BEV) को 3X वॉल्यूम फैक्टर दिया गया है। इसका मतलब है कि फ्लीट का औसत निकालते समय एक बैटरी इलेक्ट्रिक या रेंज-एक्सटेंडेड इलेक्ट्रिक वाहन को पारंपरिक ICE वाहन की तीन गाड़ियों के बराबर माना जा सकता है।
इसी तरह अलग-अलग तकनीकों के लिए फैक्टर इस प्रकार बताए गए हैं:
- Battery/Rang Extended Electric Vehicle: 3X
- Plug-in और Flex-Fuel Strong Hybrid: 2.5X
- Traditional Strong Hybrid: 1.6X
- Flex-Fuel Vehicle: 1.1X
इन प्रावधानों से कंपनियों को अपनी औसत फ्यूल एफिशिएंसी और CO2 उत्सर्जन के लक्ष्य हासिल करने में मदद मिल सकती है।
CNG और Ethanol वाली गाड़ियों को भी बढ़ावा
CAFE-III नियम सिर्फ इलेक्ट्रिक वाहनों पर केंद्रित नहीं हैं। नए नियमों के तहत CNG, इथेनॉल-ब्लेंडेड पेट्रोल और फ्लेक्स-फ्यूल इथेनॉल जैसी तकनीकों को भी अपेक्षाकृत कम CO2 उत्सर्जन के कारण प्रोत्साहन दिया गया है।
इससे वाहन निर्माता कंपनियों के पास अपने फ्लीट को ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल बनाने के लिए कई विकल्प मौजूद रहेंगे।
ज्यादा SUV बनाने वाली कंपनियों के सामने बड़ी चुनौती
नए नियमों में वाहन के वजन को भी फ्यूल एफिशिएंसी की गणना में महत्वपूर्ण फैक्टर बनाया गया है। इसका असर उन कंपनियों पर ज्यादा पड़ सकता है जिनकी बिक्री में भारी SUV और बड़े वाहन बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं।
वहीं, जिन कंपनियों के पोर्टफोलियो में हल्की और छोटी कारों की संख्या ज्यादा है, उन्हें फ्लीट एवरेज को मैनेज करने में अलग तरह का फायदा मिल सकता है।
इस व्यवस्था में कंपनियां अपनी जरूरत के हिसाब से EV, स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड, प्लग-इन हाइब्रिड, CNG और फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल का उत्पादन बढ़ा सकती हैं।
CAFE लक्ष्य पूरा नहीं करने वाली कंपनियां खरीद सकेंगी क्रेडिट
CAFE-III व्यवस्था में कंपनियों को एक और विकल्प दिया गया है। अगर कोई वाहन निर्माता निर्धारित लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाता है तो वह अपना औसत संतुलित करने के लिए लक्ष्य से बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियों से क्रेडिट खरीद सकता है।
इससे कंपनियों को तत्काल बदलाव के साथ-साथ अपनी लंबी अवधि की प्रोडक्ट रणनीति तैयार करने का भी अवसर मिलेगा।
कार कंपनियों को अब खुद तय करनी होगी रणनीति
CAFE-III नियमों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी एक तकनीक या फ्यूल को सीधे तौर पर चुनने का आदेश नहीं दिया गया है। कंपनियां अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो, बाजार की मांग और तकनीकी क्षमता के हिसाब से तय कर सकती हैं कि उन्हें अपने औसत प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए क्या करना है।
कंपनियां इसके लिए कई कदम उठा सकती हैं। इनमें ज्यादा EV और हाइब्रिड मॉडल लॉन्च करना, CNG और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की संख्या बढ़ाना, मौजूदा पेट्रोल-डीजल वाहनों की फ्यूल एफिशिएंसी सुधारना, वाहनों का वजन कम करना और कम एफिशिएंट मॉडल या वैरिएंट को हटाना शामिल हो सकता है।
भारतीय ऑटो सेक्टर के लिए क्यों अहम हैं CAFE-III Rules?
भारत में लंबे समय से फ्यूल, इंजन क्षमता और उत्सर्जन को लेकर अलग-अलग नीतिगत फैसले लिए जाते रहे हैं। नए CAFE-III नियमों में फोकस सीधे नतीजे पर रखा गया है—यानी वाहन निर्माता की पूरी फ्लीट की औसत फ्यूल खपत और CO2 उत्सर्जन को कम करना।
इससे ऑटो कंपनियों को नई तकनीक अपनाने और अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो को बाजार के हिसाब से तैयार करने की अधिक स्वतंत्रता मिल सकती है। साथ ही, EV, हाइब्रिड, CNG और फ्लेक्स-फ्यूल जैसी तकनीकों को आगे बढ़ाने की दिशा में भी कंपनियों को प्रोत्साहन मिलेगा।
आखिरकार CAFE-III नियमों का मुख्य उद्देश्य वाहनों की कुल फ्यूल खपत और CO2 उत्सर्जन को कम करना है। आने वाले वर्षों में इन नियमों का असर भारत में कार कंपनियों की नई गाड़ियों की टेक्नोलॉजी, डिजाइन और पावरट्रेन रणनीति पर साफ तौर पर देखने को मिल सकता है।

