यह एक बेहद प्रेरक खबर है जो ओडिशा के कंधमाल जिले (दारिंगबाड़ी ब्लॉक) के सिकबाड़ी गांव से सामने आई है। एक गरीब आदिवासी परिवार ने आर्थिक तंगी और अभावों के बावजूद शिक्षा को अपना हथियार बनाया और आज उसी परिवार के 5 बच्चे डॉक्टर बनने की राह पर हैं।
आपने जो खबर साझा की है, उसका एक संक्षिप्त और प्रभावकारी सारांश नीचे दिया गया है:
इस संघर्षगाथा की मुख्य बातें:
पिता का अथाह संघर्ष: बुर्सी प्रधान ने बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए अपना गांव छोड़ा और वर्षों तक केरल में दिहाड़ी मजदूरी की।
नीट (NEET) में लहराया परचम: सबसे बड़े बेटे विभीषण (जो अब इंटर्नशिप कर रहे हैं), बेटी मोनालिसा (मेडिकल द्वितीय वर्ष), और इस साल सुनेमी, एसरीय व चचेरी बहन मीनाक्षी ने नीट परीक्षा पास कर मिसाल कायम की है।
सादगी और मेहनत: ये होनहार बच्चे मेडिकल की पढ़ाई करने के बावजूद, छुट्टियों में घर आने पर मक्का और हल्दी की खेती में हाथ बंटाते हैं और पशु चराते हैं।
आर्थिक संकट: बच्चों के एडमिशन की फीस भरने के लिए परिवार को अपने बैल और बकरियां तक बेचनी पड़ीं। परिवार आज भी जर्जर घर में रहता है और ‘पखाल भात’ खाकर गुजारा करता है।
सरकार से मदद की अपील: 70 वर्ष के हो चुके बुर्सी प्रधान और उनकी पत्नी अनुसूया ने बच्चों की आगे की मेडिकल पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए सरकार से आर्थिक मदद की गुहार लगाई है।

