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Supreme Court ने कहा: आदिवासी महिलाओं को पैतृक संपत्ति पर समान अधिकार – रीति-रिवाज समानता पर हावी नहीं हो सकते

On: July 18, 2025 11:53 AM
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Supreme Court
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नई दिल्ली: Supreme Court ने गुरुवार को कहा कि अनुसूचित जनजाति समुदाय की महिला को भी अपने भाइयों की तरह पैतृक संपत्ति में समान हिस्सा पाने का अधिकार है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने अनुसूचित जनजाति की महिला धैया के कानूनी उत्तराधिकारी राम चरण और अन्य द्वारा दायर दीवानी अपील स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया।

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पीठ कहा “ जब तक कानून में अन्यथा निर्दिष्ट न हो, महिला उत्तराधिकारी को संपत्ति में अधिकार से वंचित करना केवल लैंगिक विभाजन और भेदभाव को बढ़ाता है, जिसे कानून को दूर करना चाहिए।”

Supreme Court के 17 पृष्ठों के फैसले में कहा गया “ ऐसा प्रतीत होता है कि केवल पुरुषों को अपने पूर्वजों की संपत्ति पर उत्तराधिकार देने और महिलाओं को नहीं देने के लिए कोई तर्कसंगत संबंध या उचित वर्गीकरण नहीं है खासकर उस मामले में जहां कानून के अनुसार इस तरह का कोई निषेध प्रचलित नहीं दिखाया जा सकता है।”

Supreme Court ने यह भी कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। न्यायालय ने आगे यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 15(1) में कहा गया है कि सरकार किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।

न्यायालय ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अनुच्छेद 38 और 46 के साथ यह संविधान के सामूहिक चरित्र को दर्शाता है जो यह सुनिश्चित करता है कि महिलाओं के साथ कोई भेदभाव न हो।

पीठ ने हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के माध्यम से हिंदू कानून के तहत उठाए गए ‘सबसे सराहनीय’ कदम को भी रेखांकित किया, जिसने बेटियों को संयुक्त परिवार की संपत्ति में सह-उत्तराधिकारी बनाया।

पीठ ने कहा “ यह सच है कि महिला उत्तराधिकार की ऐसी कोई प्रथा स्थापित नहीं की जा सकी लेकिन फिर भी यह भी उतना ही सच है कि इसके विपरीत कोई प्रथा ज़रा भी साबित नहीं की जा सकी है।”

ऐसे में जब प्रथा मौन है तो अपीलकर्ता (धैया के वारिसों) को उसके पिता की संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करना उसके भाइयों या उसके कानूनी उत्तराधिकारियों के अपने चचेरे भाई के साथ समानता के उसके अधिकार का उल्लंघन होगा।

Supreme Court  ने यह भी कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है

न्यायालय ने यह भी कहा कि रीति-रिवाजों की चर्चा में, निचली अदालतें इस गलत धारणा पर आगे बढ़ीं कि बेटियों को किसी भी प्रकार की विरासत की हकदार नहीं माना जाएगा और अपीलकर्ता-वादी से इसके विपरीत साबित करने की अपेक्षा की गई।

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