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जांच एजेंसियों द्वारा वकीलों को समन भेजने के मामले में Supreme Court ने स्वतः संज्ञान लिया

On: July 10, 2025 10:11 AM
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Supreme Court
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नई दिल्ली। जांच एजेंसियों और पुलिस द्वारा आरोपियों के वकीलों को नोटिस और सम्मन भेज कर बुलाने के मामले पर Supreme Court ने स्वत: संज्ञान लेकर मामला शुरू किया है। कोर्ट ने 14 जुलाई को प्रधान न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ में केस सुनवाई के लिए लगाया है।

चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ 10 जुलाई को Supreme Court में होगी सुनवाई

पीठ में जस्टिस के. विनोद चंद्रन और एनवी अंजारिया भी शामिल होंगे। आरोपियों को सलाह देने वाले वकीलों को जांच एजेंसियों द्वारा सम्मन या नोटिस भेजने का ये मामला उस समय उठा था जब गत जून में ईडी ने Supreme Court के वरिष्ठ वकील अरविंद दत्तार और प्रताप वेणुगोपाल को सम्मन भेजा था।

हालांकि बाद में ईडी ने 20 जून को सर्कुलर जारी कर जांच अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वकीलों को कोई नोटिस या सम्मन नहीं भेजा जाएगा। अगर अपवाद स्वरूप ऐसा करना पड़ा तो पहले ईडी डायरेक्टर की मंजूरी लेनी होगी।

इसके बाद गुजरात के एक मामले पर सुनवाई के दौरान गत 25 जून को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश केवी विश्वनाथन और एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने जांच एजेंसियों और पुलिस द्वारा आरोपियों के वकीलों को सम्मन भेजे जाने की घटनाओं पर चिंता जताई थी। कोर्ट ने उसी दिन संकेत दे दिये थे कि वह इस मामले पर विचार करेगा।

पीठ ने टिप्पणी की थी कि किसी मामले में पक्षकारों को सलाह देने वाले बचाव पक्ष के वकीलों को जांच एजेंसियों, पुलिस द्वारा सीधे बुलाने की अनुमति देना कानूनी पेशे की स्वायत्तता को गंभीर रूप से कमजोर करेगा और यहां तक कि न्याय प्रशासन की स्वतंत्रता के लिए सीधा खतरा होगा।

Supreme Court ने विचारणींय प्रश्न भी तय किए थे। कोर्ट ने कहा था कि दो प्रश्न विचारणीय हैं। पहला कि जब कोई व्यक्ति पक्षकार को केवल सलाह देने वाले वकील के रूप में जुड़ा हो, तो क्या जांच एजेंसी, अभियोजन पक्ष, पुलिस को सीधे वकील को बुलाना चाहिए।

Supreme Court इन दोनों मुद्दों को व्यापक आधार पर संबोधित करने की जरूरत है 

दूसरा सवाल है कि मान लीजिए एजेंसी के पास ऐसा मामला है जहां व्यक्ति की भूमिका केवल वकील की नहीं बल्कि कुछ और है तब भी क्या उन्हें सीधे सम्मन जारी करना चाहिए या ऐसी असाधारण स्थिति के लिए न्यायिक निगरानी निर्धारित की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इन दोनों मुद्दों को व्यापक आधार पर संबोधित करने की जरूरत है क्योंकि वकीलों की ईमानदारी और निडरता से अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन करने की क्षमता है।

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