नाबालिगों के गुनाहों पर माँ-बाप को सजा दे रही है पुलिस, बाल सुधार गृह की व्यवस्था को किया जा रहा नजर-अंदाज
उसैहत। क्षेत्र में कानून का तराजू उलटा लटकता नजर आ रहा है।नाबालिगों से जुड़े मामलों में अब तक तीन घटनाएं सामने आ चुकी हैं।जहां बच्चों की जगह उनके मां-बाप को जेल की सजा दी गई।बाल सुधार गृह की व्यवस्था को नजर-अंदाज कर अपनाई गई इस पुलिसिया कार्यशैली ने न्याय,कानून और संवैधानिक जिम्मेदारियों पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं।क्षेत्र के एक स्कूल में कक्षा आठ की छात्रा से दूसरे समुदाय के चार नाबालिग किशोरों द्धारा 17 दिसंबर को छेड़छाड़ करने का मामला सामने आया है।पीड़ित पक्ष ने मामले की शिकायत पुलिस से की है।

नाबालिग पर लगे आरोपों की जांच किए बिना और बाल सुधार की प्रक्रिया अपनाए बिना उसके परिजन को दंडित करना पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।कानून में स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद नाबालिग की जगह उसके भाई को जेल भेजना न सिर्फ अधिकारों का हनन माना जा रहा है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पुलिस ने इस मामले में जिम्मेदारी तय करने के बजाय आसान रास्ता चुना।
वही 22 नवंबर को कस्बे के चमेली देवी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 7-8 की छात्राओं की पानी की बोतलों में पेशाब भरने और विद्यालय की दीवारों पर अश्लील शब्द लिखने की गंभीर घटना सामने आई थी।आरोप नाबालिग लड़कों पर थे और हिंदू संगठनों की ओर से मुकदमा दर्ज कराया गया।इसके बावजूद पुलिस ने बाल कानून की प्रक्रिया अपनाने के बजाय सीधे उनके पिता इशरत अली, मो. अहमद, साबिर अली और शराफत अली को शांति भंग की धारा में गिरफ्तार कर 14 दिन जेल भेज दिया। नाबालिगों के कृत्य की जिम्मेदारी माता-पिता पर थोपकर पुलिस ने न सिर्फ कानून की मंशा को दरकिनार किया, बल्कि अभिभावकों को सार्वजनिक रूप से अपमानित कर दंडात्मक मनमर्जी का उदाहरण पेश किया। प्रभारी निरीक्षक ने डाल रहे नई परंपरा दरअसल, उसहैत थाना में प्रभारी निरीक्षक अजयपाल सिंह की तैनाती के बाद नाबालिगों द्वारा किए गए अपराधों की सजा सीधे उनके माता-पिता को दी जाने लगी है।
प्रभारी निरीक्षक अजयपाल सिंह का तर्क है।कि यदि नाबालिगों को अच्छे संस्कार मिलते तो वे इस तरह के कृत्य नहीं करते।हालांकि पुलिस की इस नई पद्धति ने कानून और न्याय की सीमाओं को चुनौती दे दी है।लोगों का कहना है कि बच्चों की जगह परिजनों को दंडित करना न सिर्फ बाल सुधार गृहों की उपयोगिता को नजर-अंदाज करता है।बल्कि बच्चों में सुधार की बजाय उनकी बिगड़ती प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है और पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर देता है।रिपोर्ट-जयकिशन सैनी (समर इंडिया)

