Gajraula water pollution protest-उत्तर प्रदेश के गजरौला में औद्योगिक प्रदूषण और दूषित पानी का मुद्दा अब एक बेहद गंभीर और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। पिछले 83 दिनों से शांतिपूर्ण तरीके से धरने पर बैठे किसानों का धैर्य अब जवाब दे चुका है। गजरौला दूषित पानी विवाद (Gajraula water pollution protest) अब आर-पार की लड़ाई में तब्दील होता नजर आ रहा है।
किसानों की मांगें अनसुनी किए जाने से नाराज किसान नेता नरेश चौधरी ने एक सख्त अल्टीमेटम जारी किया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले पानी पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो आगामी 15 मार्च को महापंचायत के दौरान वह आत्मदाह कर लेंगे।
15 मार्च को जुबिलेंट फैक्ट्री के बाहर विशाल महापंचायत
किसानों के हकों के लिए आवाज उठा रहे नरेश चौधरी ने बताया कि प्रशासन की अनदेखी के खिलाफ 15 मार्च को नाईपूरा स्थित जुबिलेंट फैक्ट्री के ठीक सामने एक विशाल महापंचायत का आयोजन किया जा रहा है। इस महापंचायत में आस-पास के ग्रामीण इलाकों से हजारों की संख्या में किसान एकजुट होंगे।
किसानों का मुख्य एजेंडा फैक्ट्रियों से बिना ट्रीट किए छोड़े जा रहे रसायन युक्त दूषित पानी के खिलाफ हल्ला बोलना है। किसानों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह महापंचायत उनके आंदोलन का एक निर्णायक दिन होगा। यदि प्रशासन और फैक्ट्री प्रबंधन ने उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया, तो वहां उग्र धरना प्रदर्शन किया जाएगा।
‘फसलें हो रहीं तबाह, घरों में फैल रहा कैंसर’
यह सिर्फ एक आम विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह गजरौला के किसानों के जीवन और मरण का प्रश्न बन चुका है। किसान नेता ने इस त्रासदी का दर्द बयां करते हुए बताया कि फैक्ट्रियों के केमिकल युक्त जहरीले पानी ने किसानों की उपजाऊ जमीनों और लहलहाती फसलों को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है।
स्थिति केवल खेती तक सीमित नहीं है; इसका सबसे भयानक असर स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। ग्राउंडवाटर और स्थानीय जलस्रोतों के प्रदूषित होने की वजह से ग्रामीण इस जहरीले पानी को पीने के लिए मजबूर हैं। नरेश चौधरी के अनुसार, इस दूषित पानी के सेवन से किसानों के परिवारों में कैंसर जैसी जानलेवा और गंभीर बीमारियां तेजी से फैल रही हैं, जो एक बड़े स्वास्थ्य संकट का संकेत है।
फाइलों में दबे सैंपल, अधिकारियों पर गुमराह करने का आरोप
किसानों के इस आक्रोश के पीछे सिस्टम की सालों पुरानी लापरवाही है। नरेश चौधरी ने प्रशासनिक अधिकारियों और प्रदूषण नियंत्रण विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे कई वर्षों से सिर्फ ‘सैंपल भरने’ की कागजी खानापूर्ति कर रहे हैं।
अधिकारियों द्वारा जांच के नाम पर लगातार किसानों को बेवकूफ बनाया जा रहा है। ग्राउंड जीरो पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है और न ही इन केमिकल फैक्ट्रियों की मनमानी पर कोई लगाम कसी गई है। किसानों का मानना है कि इस प्रशासनिक ढिलाई की वजह से ही फैक्ट्रियों के हौसले बुलंद हैं।
आत्मदाह की चेतावनी और प्रशासन पर जिम्मेदारी
83 दिनों के लंबे संघर्ष के बाद, अब किसानों ने आर-पार का मन बना लिया है। किसान नेता नरेश चौधरी ने दो टूक शब्दों में कहा है कि अगर उन दोषी फैक्ट्रियों पर तत्काल और सख्त एक्शन नहीं लिया गया, तो वे उसी प्रदर्शन स्थल पर आत्मदाह कर लेंगे।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि इस दौरान किसी भी प्रकार की जनहानि होती है या कोई अप्रिय घटना घटती है, तो इसका पूरा जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ जिला प्रशासन होगा। इस चेतावनी के बाद गजरौला का माहौल तनावपूर्ण हो गया है और अब सबकी निगाहें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं।

