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सड़क से ऑस्कर तक का सफर और फिर गुमनामी का अंधेरा! रोजाना मात्र 150 रुपये कमाकर परिवार पाल रहा है ये ‘नेशनल अवॉर्ड विनर’

On: July 15, 2026 4:07 PM
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मुंबई (गिरजा शंकर अग्रवाल)।

ग्लैमर और चकाचौंध से भरी मायानगरी मुंबई में कब कौन रातों-रात स्टार बन जाए और कब कौन अर्श से फर्श पर आ गिरे, यह कोई नहीं जानता। ऐसी ही एक दर्दनाक और गुमनामी की कहानी है 1988 की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘सलाम बॉम्बे’ (Salaam Bombay) के मुख्य बाल कलाकार शफीक सैयद की। जिस बाल कलाकार के अभिनय का लोहा पूरी दुनिया ने माना था और जिसे खुद देश के राष्ट्रपति ने ‘नेशनल फिल्म अवॉर्ड’ से सम्मानित किया था, वह आज बेंगलुरु की सड़कों पर ऑटो रिक्शा चलाकर अपना परिवार पालने को मजबूर है।

सड़क से रूपहले पर्दे तक का सफर

शफीक की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। साल 1980 में वह घर से भागकर मुंबई आ गए थे और सड़कों पर ही अपनी जिंदगी गुजार रहे थे। इसी दौरान मशहूर फिल्म निर्देशक मीरा नायर की नजर उन पर पड़ी। उन्होंने सड़क पर रहने वाले इस बच्चे के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचाना और अपनी फिल्म ‘सलाम बॉम्बे’ के लिए चुन लिया। फिल्म ऑस्कर के लिए नॉमिनेट हुई और शफीक रातों-रात स्टार बन गए।

शफीक सैयद का संघर्ष एक नज़र में:

विवरणजानकारी
अभिनेता का नामशफीक सैयद
सुपरहिट फिल्मसलाम बॉम्बे (1988) – ऑस्कर नॉमिनेटेड
निर्देशकमीरा नायर
सबसे बड़ा सम्मानराष्ट्रपति द्वारा ‘नेशनल फिल्म अवॉर्ड’
वर्तमान स्थितिबेंगलुरु में ऑटो ड्राइवर (रोजाना आय ~150 रु.)

रिजेक्शन का दर्द और मुफलिसी का दौर

इतनी बड़ी सफलता और नेशनल अवॉर्ड जीतने के बावजूद, मायानगरी ने शफीक को अपनापन नहीं दिया। बॉलीवुड में उन्हें पर्याप्त काम नहीं मिल सका। कुछ समय बाद उन्हें ‘पतंग’ और 2015 में कन्नड़ फिल्म ‘केयर ऑफ फुटपाथ 2’ जैसी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल मिले, लेकिन ज्यादातर प्रोडक्शन हाउस से उन्हें सिर्फ रिजेक्शन ही झेलना पड़ा।

आत्महत्या की कर चुके हैं कोशिश

लगातार काम न मिलने और आर्थिक तंगी से टूटकर शफीक वापस बेंगलुरु लौट गए और पेट पालने के लिए ऑटो रिक्शा चलाने लगे। रिपोर्ट्स के अनुसार, आज वे दिन भर ऑटो चलाकर बमुश्किल 150 रुपये कमा पाते हैं और उनका पूरा परिवार इसी कमाई पर आश्रित है। गुमनामी, निराशा और भयंकर आर्थिक तंगी से परेशान होकर वह अपने जीवन में दो बार आत्महत्या करने की कोशिश भी कर चुके हैं।

राष्ट्रपति से सम्मानित एक बेहतरीन प्रतिभा का इस तरह गुमनामी और गरीबी के अंधेरे में खो जाना, मनोरंजन जगत की उस कड़वी सच्चाई को बयां करता है, जहां सफलता की कोई गारंटी नहीं होती।

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