उत्तरकाशी। देवभूमि उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित रंवाई घाटी के ईष्ट और आराध्य देव, भगवान बाबा बौखनाग देवता (Baba Bokhnaag Devta) के कपाट शीतकाल के बाद पूरे विधि-विधान के साथ ग्रीष्मकाल के लिए खोल दिए गए हैं। कपाट खुलने के इस पावन अवसर पर मंदिर परिसर वैदिक मंत्रोच्चारण, शंख ध्वनि और बाबा के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। अब आगामी एक महीने तक श्रद्धालु अपने आराध्य देवता के दिव्य दर्शन और पूजा-अर्चना कर सकेंगे।
वैदिक मंत्रोच्चारण और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ खुले कपाट
प्राप्त जानकारी के अनुसार, शुभ मुहूर्त में पुजारियों द्वारा विशेष पूजा-अर्चना और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ बाबा बौखनाग देवता के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। इस ऐतिहासिक और धार्मिक क्षण का साक्षी बनने के लिए भोर से ही मंदिर परिसर में सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी थी।
कपाट खुलते ही ढोल-दमाऊ और रणसिंगा जैसे पारंपरिक पहाड़ी वाद्ययंत्रों की धुनों ने पूरे वातावरण को देवमय बना दिया।
स्थानीय ग्रामीणों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा में देव डोलियों के साथ नृत्य किया, जो यहां की समृद्ध लोक संस्कृति और गहरी आस्था का प्रतीक है।
एक माह तक चलेंगे दिव्य दर्शन, लगेगा मेला
मंदिर समिति और पुजारियों के अनुसार, कपाट खुलने के साथ ही भगवान बौखनाग के दर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया है।
परंपरा के अनुसार, अब लगातार एक माह तक बाबा के कपाट भक्तों के दर्शनार्थ खुले रहेंगे।
इस एक महीने की अवधि में रंवाई घाटी सहित आस-पास के कई गांवों और अन्य जिलों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपनी मनौतियां लेकर बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचेंगे।
इस दौरान मंदिर परिसर में भव्य मेले और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे।
अटूट आस्था का केंद्र हैं बाबा बौखनाग
रंवाई और जौनसार घाटी के लोगों की बाबा बौखनाग में गहरी और अटूट आस्था है। स्थानीय लोगों का मानना है कि बाबा बौखनाग पूरे क्षेत्र के रक्षक हैं और उनके आशीर्वाद से क्षेत्र में सुख, शांति, अच्छी फसल और समृद्धि आती है। कपाट खुलने के दिन ग्रामीण अपने घरों से नया अनाज, दूध और घी लेकर बाबा को अर्पित करने पहुंचते हैं।
कपाट खुलने के इस अवसर पर मंदिर समिति और स्थानीय प्रशासन द्वारा दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए सभी पुख्ता इंतजाम किए गए हैं, ताकि एक माह तक चलने वाले इस मेले और दर्शन प्रक्रिया में किसी भी श्रद्धालु को असुविधा का सामना न करना पड़े।

