Supreme Court कॉलेजियम ने सोमवार को बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश विपुल एम. पंचोली को Supreme Court में पदोन्नत करने की सिफारिश की है।कॉलेजियम ने न्यायाधीश पंचोली को पदोन्नत करने की सिफारिश 4-1 के बहुमत से की है।
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कॉलेजियम में पांच सदस्य है : भारत के मुख्य न्यायाधीश भूषण आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत, विक्रम नाथ, जेके माहेश्वरी और बी वी नागरत्ना। जस्टिस नागरत्ना ने पंचोली के नाम का विरोध किया है। न्यायमूर्ति पंचोली की नियुक्ति पर अपनी कड़ी असहमति दर्ज करते हुए उन्होंने कहा है कि पंचोली की नियुक्ति न केवल न्याय प्रशासन के लिए “प्रतिकूल” होगी, बल्कि कॉलेजियम प्रणाली की विश्वसनीयता को भी खतरे में डालेगी।
हमारे देश में Supreme Court में न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के जरिए होती है। यह सामान्य सिद्धांत है कि कोई भी निर्णय यदि सर्वसम्मति से नहीं हो सकता, तो फिर बहुमत से हो। लेकिन इस सिद्धांत का पालन “कॉलेजियम प्रणाली की विश्वसनीयता को खतरे में डालकर” करना कितना उचित होगा? न्यायमूर्ति नागरत्ना की असहमति से यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने असहमति के जो बिंदु उठाए हैं, वे बहुत महत्वपूर्ण हैं। न्यायमूर्ति पंचोली की पदोन्नति का विचार सबसे पहले मई में सामने आया था और उनके सहित कॉलेजियम के दो सदस्यों ने अपनी आपत्तियाँ व्यक्त की थीं। इन आपत्तियों के मद्देनजर पंचोली का प्रस्ताव रद्द कर दिया गया था। फिर तीन माह में ऐसा क्या हुआ कि फिर यही नाम सामने आ गया?
पंचोली गुजरात से आते हैं। यह सामान्य सिद्धांत है कि Supreme Court में विभिन्न उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए। आज सुप्रीम कोर्ट में कई राज्यों के उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों का प्रतिनिधित्व नहीं है, जबकि गुजरात का प्रतिनिधित्व दो न्यायाधीश कर रहे हैं। ऐसे में फिर से गुजरात को ही सुप्रीम कोर्ट में प्रतिनिधित्व देने से संतुलन बिगड़ेगा, जबकि अखिल भारतीय वरिष्ठता क्रम में पंचोली का स्थान 57वां है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने न्यायमूर्ति पंचोली की गुजरात उच्च न्यायालय से पटना उच्च न्यायालय में उनके स्थानांतरण को भी “असामान्य” बताया है और कहा है कि यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया था। यह “असामान्य” क्या था, इसे जानने के लिए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कॉलेजियम से आग्रह किया है कि 2023 के स्थानांतरण से संबंधित गोपनीय कार्यवृत्त मंगवाए जाएँ और उनका अवलोकन किया जाए।
स्पष्ट है कि ‘गोपनीयता’ के कारणों से वे इस असामान्य को सार्वजनिक नहीं कर रही है। लेकिन इससे साफ संकेत मिलता है कि यह “असामान्य” किसी भी रूप में सामान्य नहीं है और यह एक न्यायाधीश के रूप में उनकी कार्यप्रणाली, आचार व्यवहार और चरित्र से जुड़ता है, जो एक न्यायाधीश के रूप में उनकी खामियों की ओर भी इंगित करता है।
इसीलिए अपनी असहमति व्यक्त करते हुए उन्होंने यह भी कहा है कि यदि जस्टिस पंचोली की नियुक्ति होती है, तो वे अक्टूबर 2031 से मई 2033 तक चीफ जस्टिस के रूप में कार्यरत हो सकते हैं, जो उनके अनुसार संस्थान (न्यायपालिका) के हित में नहीं होगा।
जस्टिस नागरत्ना की न्यायिक निष्पक्षता निर्विवाद और काबिले तारीफ है। इसीलिए उनकी असहमति पर गौर करना जरूरी है। मोदी राज में जिस तरह से संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर हमले हो रहे हैं और उनकी स्वतंत्रता का क्षरण हो रहा है, इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट पर ही देश की आम जनता का भरोसा बचा हुआ है।
आज जब संघी गिरोह और उसके प्रतिनिधि के रूप में सत्ता में बैठी भाजपा द्वारा संविधान और उसके मूल्यों पर तीखे हमले हो रहे हैं, संविधान के संरक्षक और व्याख्याकार के रूप में, संविधान बचाने की लड़ाई में, Supreme Court की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है और पूरे देश की आशा सुप्रीम कोर्ट पर ही टिक जाती है। Supreme Court के ढहने के बाद इस बाबा साहेब आंबेडकर की अगुआई में बने इस देश के संविधान को भी ढहने से कोई नहीं बचा सकता।
इसलिए यदि पंचोली में ऐसा कुछ “असामान्य” है, जिसके चलते तीन माह पहले कॉलेजियम ने सुप्रीम कोर्ट में उनकी नियुक्ति के विचार को खारिज कर दिया था, तो उनकी नियुक्ति को तब तक वैध नहीं माना जा सकता, जब तक कि पंचोली अपनी “असामान्यता” की स्थिति से बाहर नहीं आ जाएं। इसलिए तीन माह बाद ही उनकी खारिजी को दरकिनार करके उन्हें Supreme Court में नियुक्त करने के फैसले को, बहुमत से ही सही, हरी झंडी देना ‘पर्दे के पीछे बहुत कुछ चल रहे’ होने का संदेह तो जरूर पैदा करता है।
संविधान बचाने की लड़ाई में, Supreme Court की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है और पूरे देश की आशा सुप्रीम कोर्ट पर ही टिक जाती है
इस संदेह से तो यही सहज निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 57 लोगों की वरिष्ठता को दरकिनार कर की जा रही इस नियुक्ति का आधार योग्यता तो हो नहीं सकती, इसलिए यह नियुक्ति राजनैतिक है। यदि ऐसा है, तो हमारे देश का संविधान और न्यायपालिका का भविष्य खतरे में है।

