नई दिल्ली । बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर Supreme Court में बुधवार को भी सुनवाई जारी रही। वकील अभिषेक मनु सिंघवी और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से वकील गोपाल शंकर नारायण ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। दोनों ने आयोग के 24 जून 2025 के आदेश को ‘मनमाना’ और ‘लाखों मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने वाला’ करार दिया।
वोटर प्रामाणिकता तय करना निर्वाचन आयोग का अधिकार : Supreme Court
वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग ने स्वीकार किया है कि बिहार में 65 लाख मतदाताओं के नाम बिना किसी सूचना, दस्तावेज या उचित प्रक्रिया के मतदाता सूची से हटा दिए गए।
Supreme Court ने बताया कि आयोग ने दावा किया कि इनमें से कई लाख लोग मृत हैं, कई लाख विस्थापित हैं, और कुछ लाख डुप्लिकेट हैं। लेकिन चौंकाने वाला खुलासा यह है कि कुछ लोग, जिन्हें मृत बताया गया, जीवित हैं और अदालत में पेश भी हुए; कल दो लोग इसी Supreme Court में पेश भी हुए थे। हालांकि, चुनाव आयोग के नाम हटाने के अधिकार को कोई चुनौती नहीं दे रहा है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। नाम हटाने की प्रक्रिया जटिल है और आयोग ने इसका पालन नहीं किया।
Supreme Court आयोग के 24 जून 2025 के आदेश को ‘मनमाना’ और ‘लाखों मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने वाला’ करार दिया
उन्होंने यह भी कहा कि अरुणाचल प्रदेश और महाराष्ट्र को इस प्रक्रिया से छूट दी गई, जबकि बिहार और अन्य राज्यों में इसे लागू किया गया। मैं यह नहीं कह रहा कि उन्हें बंगाल को कम समय देना चाहिए। मैं बस इतना कह रहा हूं कि एसआईआर के लिए बिहार को पर्याप्त समय देना चाहिए।
एडीआर की ओर से पेश गोपाल शंकर नारायण ने बिहार के साथ-साथ पश्चिम बंगाल में भी एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में भी बिना किसी परामर्श के प्रक्रिया शुरू कर रहा है। मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार संवैधानिक है, जो जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और 1951 के तहत सुरक्षित है।”
नारायण ने तर्क दिया कि आयोग ने एक ‘मनगढ़ंत दस्तावेज’ की मांग करके 8 करोड़ लोगों पर बोझ डाला, जिसमें नागरिकता और माता-पिता की नागरिकता साबित करने की शर्तें शामिल हैं। यहां तक कि अगर मैं जेल में भी हूं, तो भी मुझे मतदाता सूची से नहीं हटाया जाएगा। संसद ने यह अधिकार सुरक्षित किया है।

