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वोटर प्रामाणिकता तय करना निर्वाचन आयोग का अधिकार : Supreme Court

On: August 13, 2025 2:28 PM
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Supreme Court
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Supreme Court ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) यानी मतदाता सूची रिवीजन से जुड़े विवाद को ‘मोटे तौर पर विश्वास की कमी का मुद्दा’ बताया। शीर्ष अदालत ने कहा कि मतदाता सूची में नागरिकों एवं गैर-नागरिकों को शामिल करना या बाहर करना निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में है।

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जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने राजद और कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के नेताओं द्वारा दायर याचिकाओं सहित कई याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। पीठ ने याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी से कहा, ‘नागरिकता देने या छीनने का कानून संसद द्वारा पारित किया जाता है, लेकिन नागरिकों और गैर-नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल करना और बाहर करना निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में है।’

Supreme Court  ने निर्वाचन आयोग के इस निर्णय से सहमति जताई कि आधार और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा। सिंघवी के एक सवाल पर पीठ ने कहा कि यदि कुछ भी संदिग्ध पाया गया तो वह 2025 की सूची में शामिल सभी लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने का निर्देश दे सकती है।

राजद नेता मनोज झा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जब कहा कि लोगों को अपने माता-पिता के जन्म प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज खोजने में कठिनाई हो रही है, तो जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, ‘यह बहुत ही चलताऊ बयान है कि बिहार में किसी के पास दस्तावेज नहीं हैं।’ गैर सरकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इस प्रक्रिया के पूरा होने की समयसीमा और उन 65 लाख मतदाताओं के आंकड़ों पर सवाल उठाया।

Supreme Court आधार और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा

राजनीतिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव ने निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए आंकड़ों पर सवाल उठाया। पीठ ने कहा कि यदि कोई अनजाने में त्रुटि हो जाए तो उसमें सुधार किया जा सकता है, क्योंकि यह अभी केवल मसौदा तैयार करने का चरण है। आगे की सुनवाई बुधवार को होगी।

 

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