आम आदमी और महिला को “एक्ट-1978” समर्पित करना चाहता हूं, जिनके पास सरकारी अधिकारियों के हाथों काम कराने की न तो शक्ति है और न ही

aman kumar siddhu

मैं भारत के हर आम आदमी और महिला को “एक्ट-1978” समर्पित करना चाहता हूं, जिनके पास सरकारी अधिकारियों के हाथों काम कराने की न तो शक्ति है और न ही अपनी बात कहने का हक़ : आईएफएफआई 52 इंडियन पैनोरमा फीचर फिल्म निर्देशक मंजूनाथ एस.

सरकारें लोगों की सेवा के लिए होती हैं, लेकिन अक्सर,आम नागरिक को उस सेवा को पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, एक के बाद दूसरे दरवाजे जाना पड़ता है, जिसका वह हकदार है। 2020 में बनाई गई निर्देशक मंजुनाथ एस. की कन्नड़ फिल्म एक्ट–1978 इस कष्टकारी और पीड़ादायक अनुभव से बड़ी राहत देती है,एक ऐसा अनुभव जो कई बदनसीब नागरिकों के लिए बहुत अलग नहीं है।https://www.youtube.com/embed/E43cv2zRXHY

“मैं अपनी फिल्म भारत के उस हर आम आदमी और महिला को समर्पित करना चाहता हूं,जिनके पास सरकारी अधिकारियों के हाथों काम कराने की न तो ताकत है और न ही अपनी बात कहने का हक़।” फिल्म के निर्देशक मंजूनाथ एस. ने यह बात गोवा में चल रहे भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के 52वें संस्करण से इतर 24 नवंबर, 2021 को एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही। यह फिल्म महोत्सव हाइब्रिड प्रारूप में 20नवंबर से शुरू है जो 28 नवंबर, 2021 तक गोवा में चलेगा।

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इस फिल्म को आईएफएफआई में फिल्म प्रेमियों को समारोह के भारतीय पैनोरमा खंड की फीचर फिल्म श्रेणी में प्रस्तुत किया गया है।

इसके निर्देशक ने आईएफएफआई के प्रतिनिधियों को बताया कि यह फिल्म दर्शकों को एक सामान्य महिला द्वारा शासनव्यवस्था और नौकरशाही में खामियों को दूर करने के लिए संघर्ष में भाग लेने के लिए आमंत्रित करती है। नायिक गीता एक गर्भवती विधवा है, जिसे सरकार द्वारा पहले से ही स्वीकृत धन पाने के लिए शासन व्यवस्था द्वारा एक कार्यालय या स्थान से दूसरे स्थान पर दौड़ते रहने के लिए मजबूर किया जाता है। जब अपना काम कराने की उसकी बार-बार की कोशिश विफल हो जाती हैं तो वह अपने अधिकार का दावा करने के लिए बिल्कुल अपरंपरागत रास्ता अपनाने से नहीं कतराती है।

काम के लिए घूस मांगे जाने से तंग आकर गीता ने एक दिन फैसला कर लिया कि अब काफी हो चुका है। वह अपना हक पाने के लिए हिंसक रास्ता अपनाती है, वह अपने पेट पर बम बांधकर सरकारी कार्यालय में पहुंच जाती है। निर्देशक मंजूनाथ ने बताया कि “यह एक महिला द्वारा उस व्यवस्था के मूल को हिला देने के लिए एक उग्र बेचैनी है जिसने उसे विकल्पहीन बना रखा है”।

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दमदार और सवालिया फिल्म बनाने की यह प्रेरणा निर्देशक के निजी अनुभव से मिली है जो फिल्म में जीवंत हो उठता है। उन्होंने बताया “एक्ट -1978 बनाने की मेरी प्रेरणा व्यक्तिगत है। यह मेरे दिवंगत पिता की पेंशन फाइल के संबंध में एक सरकारी कार्यालय से संपर्क करने पर मैंने जो अनुभव किया है,उससे संबंधित है।”

निर्देशक ने याद करते हुए बताया कि कैसे व्यवस्था जानबूझकर फाइल आगे बढ़ाने की प्रक्रिया में देरी कर रहा था और इस वजह से वो किस तरह परेशान हुए। उन्होंने बताया “कई महीनों तक यहां से वहां दौड़ – भाग करने के बाद भी जब मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचातो मैंने अपना पुराना मीडिया कार्ड लिया और उन्हें धमकी दी कि अगर वे तुरंत कार्रवाई नहीं करेंगे तो उस पर मीडिया कवरेज होगा।”

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फिल्म का शीर्षक एक्ट -1978 कर्नाटक सिविल सेवा अधिनियम 1978 के संदर्भ में है। मंजूनाथ ने खुलासा करते हुए बताया कि अपने पिता के पेंशन के मामले में उन्हें जिस कष्टदायक अनुभव से गुजरना पड़ा,उसने उन्हें इस अधिनियम का बहुत गहराई से अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा “मैंने पाया कि अधिकांश सरकारी अधिकारियों के मन में आम आदमी के लिए सम्मान की कोई भावना नहीं है। क्यों? क्योंकि वे जानते हैं कि अगर वे गलत करते हैं तो भी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। यहां तक ​​कि अगर कुछ दंडात्मक कार्रवाई शुरू की जाती है, तो वे इससे बचने के तरीकों से अच्छी तरह वाकिफ हैं।”

यह फिल्म नौकरशाही की घिनौनी स्वार्थी प्रवृत्ति पर एक अडिग और स्पष्ट रूप से तीखा हमला है। निर्देशक मंजूनाथ ने कहा,”मेरा मानना ​​​​है कि नौकरशाही अपने फायदे के लिए उन नियमों और विनियमों का दुरुपयोग करती है,जो आम आदमी के फायदे के लिए बनाए गए हैं। उन्होंने कहा कि यह फिल्म भ्रष्टाचार और नौकरशाही की लापरवाही जैसी कई प्रणालीगत बीमारियों से लड़ने की कोशिश करती है।

निर्देशक मंजूनाथ एस. का कहना है कि नायिका गीता इन अन्यायपूर्ण और भ्रष्ट तरीकों पर सवाल उठाती है। उन्होंने कहा “मेरी फिल्म की नायिका सरकारी अधिकारियों की उदासीनता, भ्रष्टाचार और उपेक्षा पर सवाल उठाती है। वह उन्हें एक मानव के रूप में उसके साथ व्यवहार करने के लिए कहती है। फिल्म का प्रतिष्ठित संवाद ‘आई नीड रेस्पेक्ट’ यानी मुझे सम्मान चाहिए पूरे सिस्टम के लिए उनका गुस्सा है।”

निर्देशक को उम्मीद है कि फिल्म‘एक्ट-1978’ बदलाव की लहर पैदा करेगी,दर्शकों को गंभीर चिंतन और प्रबुद्ध कार्रवाई के लिए प्रेरित करेगी। उन्होंने कहा “एक बदलाव की जरूरत है,और मैंने इस फिल्म के जरिए बदलाव के लिए जरूरी विचार के बीज बोने की कोशिश की है।”

मंसूर,उर्फ ​​मंजुनाथ सोमकेशा रेड्डीएक कन्नड़ फिल्म निर्देशक हैं। उनकी पहली फिल्म ‘हरिवु’ (2014) ने राष्ट्रीय पुरस्कार जीता,जबकि ‘नाथिचारमी’ (2018) ने चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते।

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