न्यायालयों की अधिकृत भाषा बने मातृभाषा हिंदी*

*न्यायालयों की अधिकृत भाषा बने मातृभाषा हिंदी*

 

 

Samar  india amroha

 

अमरोहा । हिंदी दिवस के अवसर पर जिला न्यायालय के अधिवक्ताओं ने विचार गोष्ठी में कहा कि हिंदी को सर्वोच्च सम्मान तब ही मिलेगा, जब न्यायालयों की भाषा पूर्णतः हिंदी हो जाए ।

बुधवार को जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर में स्थित बार एसोसिएशन हॉल में हिंदी दिवस पर आयोजित विचार गोष्ठी में अधिवक्ताओं को संबोधित करते हुए बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कृपाल सिंह यादव एडवोकेट ने कहा कि हर वर्ष 14 सितम्बर को हम “हिंदी दिवस” मनाते हैं, भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एकमत से यह निर्णय लिया कि हिंदी की खड़ी बोली ही भारत की राष्ट्रभाषा होगी । हालांकि इसे 1950 को देश के संविधान द्वारा आधिकारिक भाषा के रूप में उपयोग करने का विचार स्वीकृत किया गया था। भारत के लिए यह गर्व का क्षण था । जब भारत ने हिंदी को आधिकारिक रूप से अपनाया था । हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्घा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से सम्पूर्ण भारत में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है ।

 

 

विचार गोष्ठी में बतौर मुख्य वक्ता संबोधित करते हुए बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश के विशेष प्रतिनिधि मनु शर्मा एडवोकेट ने कहा कि 14 सितम्बर को हम हिंदी दिवस बहुत खुशी और हर्सोल्लास के साथ लेख, कविता, निबंध लिखते हैं, भाषण भी देते हैं। हिंदी दिवस पर हम भारतीय संस्कृति पर बातें करते हैं राष्ट्रहित में हिंदी की मेजबानी करते हैं। हिंदी हिंदुस्तान की भाषा है, राष्ट्रभाषा किसी भी देश की पहचान और उसका गौरव होती है । इसके प्रति अपना प्रेम और सम्मान प्रकट करना हमारा नैतिक कर्तव्य है । इस संबंध में वे कहते हैं कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, साक्षर से लेकर निरक्षर तक प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति हिंदी भाषा को आसानी से समझ और बोल लेता है हिंदी की यही पहचान है कि इसे बोलना और समझना आसान है। इसलिए सभी न्यायालयों में जब आधिकारिक रूप से इसका प्रयोग किया जाने लगेगा तभी इसे संपूर्ण सम्मान मिल सकेगा ।

 

 

बार एसोसिएशन के सचिव पंकज कुमार एडवोकेट ने कहा कि पहले के समय में अंग्रेजी भाषा का ज्यादा चलन नहीं हुआ करता था । तब हिंदी भाषा भारतवासियों और भारत से बाहर रह रहे लोगों के लिए सम्माननीय होती थी। बदलते वक़्त के साथ अंग्रजी ने भारत की जमीं पर अपने पांव जमा लिए हैं। पहले जहां स्कूलों में अंग्रेजी का माध्यम इतना नहीं होता था । वहीं आज सिर्फ अंग्रेजी की मांग बढ़ने के कारण देश के बड़े बड़े विद्यालयों के बच्चे हिंदी में पिछड़ते जा रहे हैं । आज हिंदी की दशा ये हैं कि बच्चों को सही उच्चारण में हिंदी बोलने या लिखनी में दिक्कत आती हैं।

 

 

पूर्व सचिव अमित कुमार जैन एडवोकेट ने कहा कि भारत में हिंदी को अंग्रेज़ी से कमत्तर मनाने वालों की संख्या में पिछले कई दशकों में कई गुना इज़ाफ़ा हुआ हैं। इसी कारण हम अंग्रेजी से अछूते नहीं रह पा रहे हैं और हम हिंदी के शब्दों को भी अमली जामा पहनाने की भरपूर कोशिश करते हैं। आज हर अभिभावक अच्छी शिक्षा के लिए अपने बच्चों कॉन्वेंट (अंग्रेज़ी भाषाई) विद्यालयों शिक्षा दिलाना चाहतें हैं । क्यूँकि अभिभावकों को लगता हैं

 

 

कि आज के दौर में हिंदी माध्यम के विद्यार्थी के लिए रोजगार और व्यवसाय में कोई खास मौके नहीं मिलते हैं । जों काफी हद तक ये सच भी हो रहा है। आजकल हर तरह के व्यवसाय के लिए अंग्रेजी बोलना सीखना जरूरी है ।यहीं कारण हैं कि हिंदी जानने और बोलने वालों को दोयम दर्जे का समझा जाता है या कह सकते हैं। व्यवसायिक या शैक्षणिक संस्थानों में हिंदी बोलने वालों को लोग एक अलग नजरिए से देखते हैं। इसका यें मतलब बिलकुल नहीं हैं कि किसी भी भारतीय के लिए हिंदी से दूरी बनाना जरूरी हैं । भारतीय संकृति,परम्पराओं, संस्कारों, आदर्शो की हिंदी भाषा साक्षी रही हैं।

 

 

युवा अधिवक्ता डॉ रविंद्र शुक्ला एडवोकेट ने कहा कि 14 सितम्बर को “हिंदी दिवस” के रूप मानाकर हिंदी का उत्थान नहीं किया जा सकता हैं । हिंदी का उत्थान तभी हों पायेगा जब हिंदी को वैश्विक स्तर लाने के लिए व्यापक स्तर सूचना प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ा जाये नहीं तो पुनरुत्थान की ज़रूरत ना पड़ जाये। विचार गोष्ठी की अध्यक्षता कृपाल सिंह यादव एडवोकेट एवं संचालन पंकज कुमार एडवोकेट ने किया । इस अवसर पर मुख्य रूप से बीपी माथुर, शैलेंद्र कुमार शर्मा, संजीव कुमार शर्मा, आदिश सैफी, दिनेश सिंह, खुसरो नदीम, दाऊद रिजवी, राजीव कुमार गोले, धर्मेंद्र पंवार, चरन सिंह चन्नी, नदीम अहमद, अर्जुन सिंह, मोहम्मद हसन आदि अधिवक्ता उपस्थित रहे ।

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