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तीन नैनोमीटर से छोटे आकार वाले एरोसोल कण, जो जलवायु को प्रभावित करने वाले आकार तक पहुंच सकते हैं, अक्सर भारत के शहरी स्थानों में बनते हैं

by AMAN KUMAR SIDDHU
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भारत के किसी एक शहरी स्थान पर 3 नैनोमीटर (एनएम) से छोटे आकार वाले एरोसोल कणों के संकेन्द्रण, उनके आकार और विकास का पता लगाने वाले वैज्ञानिकों ने वातावरण में लगातार सब-3 एनएम एरोसोल कणों को बनते हुए पाया है। यह इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि इन नए बने कणों का एक बड़ा अंश बढ़ते हुए बादल संघनन नाभिक के आकार तक पहुंच सकता है जहां उनका प्रभाव जलवायु पर पड़ता है।

सब-3 एनएम आकार के छोटे आण्विक समूहों के बनने की प्रक्रिया को तकनीकी रूप से एरोसोल न्यूक्लिएशन कहा जाता है और इन नए बने समूहों के बड़े आकार तक पहुंचने की प्रक्रिया को वायुमंडलीय नए कण का सृजन (एनपीएफ) कहा जाता है। एनपीएफ की परिघटना स्थलीय क्षोभमंडल में हर जगह होती है और इसलिए यह वायुमंडल में एरोसोल संख्या का एक बड़ा स्रोत है। हालांकि मैदानी अवलोकनों, प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों और मॉडलिंग दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए इस बारे में विश्व स्तर पर व्यापक रूप से अध्ययन किया गया है, लेकिन भारत में यह क्षेत्र कमोबेश अछूता रहा है।

हैदराबाद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भारत के एक शहरी स्थान पर पहली बार अनावेशित सब-3 एनएम आकार के कणों को मापा। डॉ. विजय कानावाडे और श्री मैथ्यू सेबेस्टियन ने 1 से लेकर 3 एनएम की आकार सीमा में कणों के आकार संबंधी वितरण को मापने के लिए एयरमोडस नैनो कंडेनसेशन न्यूक्लियस काउंटर (एनसीएनसी) का उपयोग किया।

जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम प्रभाग के तहत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) द्वारा समर्थित इस अध्ययन में, इन दोनों वैज्ञानिकों ने जनवरी 2019 से हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर स्थल पर, जहां एरोसोल न्यूक्लिएशन की प्रक्रिया चालू होती है, निरंतर पर्यवेक्षण किया और सब-3 एनएम आकार की व्यवस्था में छोटे आण्विक समूहों के बनने की दर के बारे में जानकारी दी। उनका यह शोध हाल ही में ‘एटमोसफेरिक एनवायरनमेंट’ नाम की पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

इस शोध में यह दर्शाया गया है कि सब-3 एनएम आकार के कणों का एक समुच्चय अक्सर वातावरण में मौजूद होता है, लेकिन इन समूहों के बढ़ने की गति की तीव्रता विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इनमें से केवल आधी परिघटनाओं में नए बने आण्विक समूह 10 एनएम के आकार को पार करते हुए दिखे। इस प्रकार, इन कणों के आकार का वितरण एक पारंपरिक केले के आकार में एरोसोल के विकास को प्रदर्शित करता है, जोकि क्षेत्रीय एनपीएफ परिघटना का संकेत है।

अनुसंधान में लगे वैज्ञानिकों की टीम ने सब-3 एनएम आकार के कणों की सांद्रता और सल्फ्यूरिक एसिड की सांद्रता के बीच एक मजबूत सकारात्मक सहसंबंध पाया, जो सब-3 एनएम कणों के निर्माण में सल्फ्यूरिक एसिड की संभावित भूमिका की पुष्टि करता है। यो तो एनपीएफ की परिघटना वातावरण में अक्सर सल्फ्यूरिक एसिड के साथ शुरू होती है, लेकिन अकेले सल्फ्यूरिक एसिड वातावरण में देखे गए कणों के बनने की प्रक्रिया और उनकी विकास दर की व्याख्या करने में विफल रहता है। अमोनिया, एमीन्स और ऑर्गेनिक्स जैसे अन्य वाष्प इन नए बने कणों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा, ये नए बने कण हमेशा बड़े आकार में नहीं बढ़े और वैज्ञानिकों की टीम ने यह अनुमान लगाया कि इन कणों की वृद्धि कार्बनिक यौगिकों जैसे संघनित वाष्पों की कम सांद्रता की वजह से सीमित थी। इसको देखते हुए, पूरे भारत में विविध वातावरणों में एनपीएफ को चलाने वाले तंत्र के बारे में समझने के लिए अत्याधुनिक उपकरणों का उपयोग करके अनुसंधान की जरूरत महसूस की गई।

चित्र 1. टाइप-I (ओपन सर्किल) के लिए सल्फ्यूरिक एसिड सांद्रता ([H2SO4] प्रॉक्सी) के एक कार्य के रूप में सब-एनएम कण सांद्रता (Nsub-3nm) बनाम 1.4 एनएम कणों (J1.4) की प्रति घंटा में कण के बनने की औसत दर का स्कैटर प्लॉट और टाइप- II (प्लस साइन) हैदराबाद में एनपीएफ इवेंट। दुनिया भर में विविध वातावरण में अन्य साइटों के लिए J1.4, Nsub-3nm, और [H2SO4] प्रॉक्सी के माध्य मान भी तुलनात्मक विश्लेषण के लिए प्लॉट किए गए हैं। * सर्दियों के समय के माप को इंगित करता है। रंग पैमाना [H2SO4] प्रॉक्सी की सांद्रता को दर्शाता है।

प्रकाशन लिंक:

https://doi.org/10.1016/j.atmosenv.2021.118460

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