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आखिर गांव के लोग इतना बदल कैसे गए इसका जिम्मेदार कौन?

by AMAN KUMAR SIDDHU
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गाँव के लोग:
दरअसल हम गांव के लोग जितने खुशहाल दिखते हैं उतने हैं नहीं। जमीनों के केस, पानी के केस, खेत-मेढ के केस, रास्ते के केस, मुआवजे के केस, व्याह शादी के झगड़े, दीवार के केस,आपसी मनमुटाव, चुनावी रंजिशों ने समाज को खोखला कर दिया है।

अब गांव वो नहीं रहे कि जब कभी बस में गांव की लड़की को देखते ही सीट खाली कर देते थे। बच्चों/किशोरों दो चार थप्पड़ गलती पर किसी बुजुर्ग या ताऊ ने टेक दिए तो इश्यू नहीं बनता था ।
अब हम पूरी तरह बंटे हुए लोग हैं। गांव में अब एक दूसरे की उपलब्धियों का सम्मान करने वाले, प्यार से सिर पर हाथ रखने वाले लोग संभवत अब मिलने मुश्किल हैं।

हालात इस कदर खराब है कि अगर पड़ोसी फलां व्यक्ति को वोट देगा तो हम नहीं देंगे। इतनी नफरत कहां से आई है लोगों में ये सोचने और चिंतन का विषय है। आज गांव में युवाओं को देखे तो शराब,भांग, गोली, कैप्सूल, इंजेक्शन एवं कई तरह के नसे का चलन जिस तरह से बढ़ा है आने वाली पीढ़ी भी अपंग पैदा होगी क्या इस पर किसी का ध्यान है।

संयुक्त परिवार अब बचे नहीं, कई घरों में बुजुर्ग मां- बाप का सम्मान नहीं रहा है एवं घर सम्पत्ति की तरह से मां- बाप का भी बंटवारा कर दिया है । बंटवारा केवल भारत का नहीं हुआ था, आजादी के बाद हमारा समाज भी बंटा है और शायद अब हम भरपाई की सीमाओं से भी अब दूर आ गए हैं। अब तो वक्त ही तय करेगा कि हम और कितना बंटेंगे।

एक दिन यूं ही बातचीत में एक मित्र ने कहा कि जितना हम पढ़े है उतने प्रकृति एवं समाज से दूर हुऐ हैं। गहराई से सोचें तो ये बात सही लगती है कि पढ़े-लिखे लोग हर चीज को मुनाफे से तोलते हैं और ये बात समाज को तोड़ रही है।

विजयपाल यादव
जीवन विद्या प्रतिष्ठान गोविंदपुर, खारी (बिजनौर)

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