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अधिवक्ता मुजाहिद चौधरी के नाम से मशहूर साहित्यिक संस्था पोएट्स फैमिली द्वारा”आज का दिन मुजाहिद के नाम….” वर्चुअल काव्य सम्मेलन आयोजित किया गया

by AMAN KUMAR SIDDHU
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हसनपुर
मंडल के वरिष्ठ साहित्यकार, हिंदी और उर्दू व अंग्रेजी तीनों भाषाओं में कविताएं, ग़ज़ल और गीत लिखने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता मुजाहिद चौधरी के नाम से मशहूर साहित्यिक संस्था पोएट्स फैमिली द्वारा”आज का दिन मुजाहिद के नाम….” वर्चुअल काव्य सम्मेलन आयोजित किया गया ।
जिसमें मुजाहिद चौधरी द्वारा सर्व प्रथम 5 रचनाएं प्रस्तुत की गईं । ग्रुप संचालक द्वारा उनका परिचय प्रस्तुत करने के बाद अन्य कवि- कवयत्रियों दवारा उनकी रचनाओं की काफी प्रशंसा व सराहना की गई और साहित्यिक सेवा के प्रति उनका आभार व्यक्त किया गया । राकेश श्रीवास्तव ने कार्यक्रम की शुरुआत अपनी इस रचना से की,”पूरब से आया सूरज,चहूंओर मिटा अंधेरा । पेड़ों से उड़ने परिंदे छोड़कर अपना डेरा ।। मस्त-मस्त चलने लगी हैं सुगंध भरी हवाएं । फूलों ने भी मुस्कुरा के धरती पे रंग बिखेरा ।। जयपुर से डॉ.निशा माथुर ने रचना प्रस्तुत करते हुए कहा, “समय के पास कागज कलम नहीं पर, वो हिसाब रखता है । समय समय है,समय ही हर समय की किताब रखता है ।। समय ही हर इंसान का रुतबा और रुआब रखता है । समय का ये खेल है दोस्तों समय भी अपना शबाब रखता है ।।” गंगा ने अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा,”मन करता है मैं भी चिट्ठी एक तुम्हारे नाम लिखूं,विश्व में फैले आतंकी संगठनों पे लगाम कसूं।।” डॉ.विष्णुकांत अशोक ने सामायिक रचना प्रस्तुत करते हुए कहा,”,कभी ऑक्सीजन के लिए,कभी डॉक्टर के लिए । कभी दवाओं के लिए संघर्ष कर रहा हूँ ।। हाँ मैं भारतीय नागरिक हूँ रोज रोज मर रहा हूँ।।” संजय बागी ने अपनी रचना कुछ यूं प्रस्तुत की,”कभी आँखों से कहती है,कभी लब खोल देती है । लबों की जान लेता हूँ,नयन की मान लेता हूँ ।। डॉ.यासमीन मूमल ने कहा,”मचा कहर खुदगर्ज़ी,लाचारी,कैसी बीमारी । रब से डर,जुमले जा ठहर,क्यों लूटे घर। क़ैद हैं घर, बेरोज़गारी सर, दुःखी हुनर। पंछी कवि ने अपनी व्यंग्य रचना मुजाहिद चौधरी को समर्पित करते हुए कहा,सही कहा आपने कभी देश को आज़ाद कराने के लिए लोग जेल जाया करते थे,उसमें उन्हें गर्व भी होता था ।। आज घोटाले करके जेलयात्रा करने में गर्व होता है ।। जेल से बाहर आते हैं,तो फ़िल्मी हीरो की तरह उनका स्वागत होता है,चाहे लालू जी हों या फिर चाहे शशिकला ।। राहत बरेलवी ने कहा “इंसान भी कमाल है सहाब । ड्रामे में लोगों का दुख-दर्द देख कर रो पड़ता है । और असल में लोगों के दुख-दर्द को ड्रामा समझता है ।। आज का दिन मुजाहिद के नाम… कार्यक्रम के अंत में मुजाहिद चौधरी ने समापन रचना प्रस्तुत करते हुए कहा… मौत है चारों तरफ फिर भी बहुत अच्छा हूं मैं । है कयामत का समां फिर भी बहुत अच्छा हूं मैं ।। अपनी सांसों से मैं खायफ़ हूं करूं तो क्या करूं । भूखा हूं प्यासा हूं मैं,फिर भी बहुत अच्छा हूं मैं ।। खून पानी और हवाएं बिक रहीं है अब यहां । घुट रहा है दम मेरा फिर भी बहुत अच्छा हूं मैं ।। कब्रगाहों और श्मशानों में हैं लाशों के ढेर । रोज़ थोड़ा मर रहा हूं फिर भी बहुत अच्छा हूं मैं ।। मरने से पहले बिका फिर बिका मरने के बाद । सस्ते दामों में बिका फिर भी बहुत अच्छा हूं मैं ।। चांदनी, शबनम ,सबा ,खुशबू ज़मीनों,आस्मां । इनसे रिश्ता तोड़ कर फिर भी बहुत अच्छा हूं मैं ।। मेरे मां और बाप ने मुझको सौंपा था जिसे । वो तड़प कर मर गया फिर भी बहुत अच्छा हूं मैं । अब मुजाहिद को कोई ग़म भी रुला सकता नहीं । अपने घर में कैद हूं फिर भी बहुत अच्छा हूं मैं ।।


मुजाहिद चौधरी एडवोकेट
स्तंभ लेखक,विश्लेषक,कवि,
हसनपुर, अमरोहा

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